पल-पल उसका साथ निभाने आए हम ,
ईश्वर के पश्चात् हम सर्वाधिक ऋणी नारी के हैं -प्रथम तो जीवन के लिए फिर उसको जीने योग्य बनाने के लिए ।
जिस समय नारी का हृदय आगार बन जाता है , उस समय उससे कोमल कोई वस्तु संसार में नहीं रह जाती ।
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी ।
आंचल में है दूध और आंखों में पानी ।।
एक इशारे पर अपनी दुनिया छोड़ आए हम
समंदर के बीच पहुंचकर फरेब की उसने
वो कहते तो किनारे पर ही डूब जाते हम ।
मुहब्बतों में अगर कोई रश्मों-रिवाज ना हो
सुकून तबाह ना हो , जिंदगी गुनाह ना हो ।
कुछ अटकलें भी लाजिमी है दिल्लगी के लिए
किसी से प्यार अगर हो तो बेपनाह ना हो।
इस एहतियात से मैं तेरे साथ चलता था ,
तेरी निगाहों से आगे मेरी निगाहें ना हो ।
मेरा वजूद है सच्चाइयों का आइना ,
ये बात और कहने वाला मेरा कोई गवाह
ना हो ।।
रोती हुई आंखों में इंतजार होता है ,
ना चाहते हुए भी क्यों प्यार होता है ।
क्यों देखते हैं हम वहीं सपने जिनके टूटने
पर भी उनके सच होने का इंतजार होता है
अपने प्यार का इजहार कैसे करूं
दूर भी इतना उनसे कैसे रहूं।
मैंने सब कुछ कब का उनके नाम कर दिया
उनके सामने जाकर इकरार करूं तो कैसे करूं।।
कुछ अनमोल बातें
जहां नारी का सम्मान होता है , वहां देवता भी प्रसन्न रहते हैं।।
जिस परिवार में नारियों का सम्मान नहीं होता , वह पतन और विनाश के गर्त में लीन हो जाता है ।।
पति के लिए चरित्र, संतान के लिए ममता , समाज के लिए शील , विश्व के लिए दया तथा जीव के लिए करूणा संजोने वाली महाप्रकृति का नाम ही नारी है ।।
ईश्वर के पश्चात् हम सर्वाधिक ऋणी नारी के हैं -प्रथम तो जीवन के लिए फिर उसको जीने योग्य बनाने के लिए ।
जिस समय नारी का हृदय आगार बन जाता है , उस समय उससे कोमल कोई वस्तु संसार में नहीं रह जाती ।
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी ।
आंचल में है दूध और आंखों में पानी ।।
कांटों भरी शाख को फूल सुंदर बना देते हैं और गरीब से गरीब आदमी के घर को लज्जावती नारी सुंदर और स्वर्ग बना देती है ।।
नारियों की अवस्था में सुधार न होने तक विश्व के कल्याण का कोई मार्ग नहीं ।।
किसी पंछी का एक पंख के सहारे उड़ना नितांत असंभव है ।।
संसार में एक नारी को जो कुछ करना है , वह पुत्री , बहन , पत्नी और माता के पावन के अंतर्गत आता है ।।
जीवन में जो कुछ पवित्र और धार्मिक है , नारियां उसकी विशेष संरक्षिकाएं है।।
नारी तुम केवल श्रद्धा हो , विश्वास रजत नग पगतल में ।
पीयूष श्रोत सी बहा करो ,जीवन के सुंदर समतल में ।।
नारी की उन्नति और अवनति पर ही , राष्ट्र की उन्नति और अवनति निर्भर है ।।
समाज में आचरण को बनाना ,घर का प्रबंध करना तथा कोमलता , प्रेम और सहनशीलता से जीवन की विषम और कठिन यात्रा को सरल और सुखद बनाना नारी का कार्य है ।।
नारी यौवन काल में गृह देवी मध्य काल में सच्ची साथी और वृद्धावस्था में परिचारिका का काम करती है ।।
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