इन्द्रधनुष जैसी सतरंगी दुनिया सही सलामत है ,
आँखें उजड़ गई तो क्या है ,सपना सही सलामत है।
जिसका इक - इक तिनका यारों बर्षों पहले बिखर गया ,
मेरी नजर मे उस घर का नक्शा सही सलामत है ।
हालातों ने कील ठोक दी बेशक अपने सीने मेंं,
मगर गांव मे जाकर सबसे कहना सही सलामत है ।
जिसके शब्दों को हमने आँसू जल से लिखा था ,
उस किताब का अब तक पन्ना-पन्ना सही सलामत है ।
आने वाला वक्त गढ़ेंगे हम खुद अपने हाथों से ,
तन का सबल टूट गया पर मन का सही सलामत है ।
जिस भय की खातिर युग-युग से , हम मर-मर के जिते है ,
जिस सुबह के अमृत की धुन मे , हम जहर के प्याले पीते है ,
इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फरमाएगी ,
वो सुबह कभी तो आएगी ।
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ये महलों ये तख्तों ,ये ताजों की दुनिया ,
ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया ,
ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया ,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ?
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