ऐ गोल्डेन बर्ड किसी से सिर्फ इतना ही दूर होना कि उसे आपकी अहमियत का पता लग जाए...।
जब जिन्दगी समझ आई तो ,जिन्दगी से दूर थे हम ...।
जिना चाहा पर मरने को मजबूर थे हम ,हर सजा कुबूल की हमने सर झुका कर , कुसूर इतना था कि बेकसूर थे हम ...।
इक मासूम सी मुहब्बत का बस यही फसाना है ..
कागज की हवेली है बारिश का जमाना है ..।
क्या शर्ते मुहब्बत है क्या शर्ते जमाना है .......
आवाज भी जख्मी है और वो गीत भी गाना है..।
उस पार उतरने की उम्मीद भी बहुत कम है .....
कश्ती भी पुरानी है और तूफान को भी आना है ।
समझे या ना समझे वोअंदाज मुहब्बत के ...
एक खास शख्स को आँखो से एक शेर सुनाना है..।
भोली सी अदा कोई फिर इश्क की जिद पर है , फिर आग का दरिया है और डूब के जाना है ।
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