हर शाम तेरी यादों का लगता पहरा ,
खामोशियों से खेलती धड़कनों को भी
जैसे ख्याल है तेरा ।
हर मोड़ पर दिल तुम्हें ढूँढता फिरता,
पर हर आहट पर
हमेशा कोई और ही मिलता ।
शाम से रात आई , तुम न आए मगर
यादों का पहरा हुआ और घनेरा
हर रात मेरे पास होती सिसकियाँ
सवालों का समंदर फिर भी खामोशियाँ
आँखेंं नम भी हुई ,
तुम न आए मगर ।
तन्हाइयों ने अपनी बांहों मे घेरा
हर बार चांदनी मे डूबा
चाँद - तारों की बारात होती
मेरे दिल मे इंतजार का चिराग
और मिलन की सौगात होती
रात ढल भी गई
तुम न आए मगर ।
मेरी आँखों मे रह गया
दूर तक छाया अँधेरा
बेचैन अँधेरा स्याह मगर
इस तड़पते दिल को सुकून देने
तुम न आए मगर ।
.......😰😰😰😰
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